78 साल बाद… गांधी, अंबेडकर, भगत सिंह का सपना अधूरा?
आज… 15 अगस्त है।
वो दिन… जिसने 1947 में हमारे देश को आज़ादी दी।
वो पल, जब हमने नेहरू-जी का मशहूर भाषण “Tryst with Destiny” सुना,
जहाँ उन्होंने कहा था:
“जब घड़ी की सुइयां आधी रात पर होंगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के साथ जागेगा।”
यह सिर्फ़ राजनीतिक स्वतंत्रता का पल नहीं था।
यह गांधी-जी के सत्याग्रह का परिणाम था…
यह भगत सिंह की बलिदान की कहानी थी…
यह अंबेडकर-जी के उन हाथों की मेहनत थी, जिन्होंने हमें एक संविधान दिया।
सवाल यह है… 78 साल बाद, क्या हम सचमुच आज़ाद हैं?
गांधी-जी के लिए आज़ादी का मतलब था ‘सर्वोदय’ — सबका विकास, सबकी उन्नति।
उन्होंने समझाया कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आत्मसम्मान, सामाजिक समानता और सांप्रदायिक सौहार्द भी ज़रूरी है।
डॉ. अंबेडकर ने चेतावनी दी थी:
“जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं करते, तब तक कानून द्वारा दी गई कोई भी स्वतंत्रता आपके लिए व्यर्थ है।”
और उन्होंने यह भी कहा था:
“सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र एक मज़ाक है।”
अर्थात, अगर समाज में समानता नहीं है, तो आज़ादी सिर्फ़ कागज़ पर लिखी एक पंक्ति बनकर रह जाती है।
और फिर… भगत सिंह।
वह नौजवान जिसने लिखा:
“वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते।
वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन मेरी आत्मा को कभी नहीं कुचल पाएंगे।”
उसने केवल ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि अपने समाज के अंदर जमी जाति-आधारित और वर्ग-आधारित अन्यायों के ख़िलाफ़ भी लड़ाई लड़ी।
लेकिन आज… हम कहाँ खड़े हैं?
हाँ, भारत दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है,
स्पेस में जा रहा है, और विश्व नेताओं के साथ कंधा मिला रहा है।
लेकिन… क्या यह वही भारत है जिसका सपना गांधी, अंबेडकर और भगत सिंह ने देखा था?
सच यह है:
आज भी हमारे आसपास सांप्रदायिक तनाव, भ्रष्टाचार, जातिगत भेदभाव और लैंगिक अन्याय मौजूद हैं।
किसी दलित को मंदिर में जाने से रोका जाता है… किसी लड़की को रात में अकेले चलने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है।
कोई किसान कर्ज़ के बोझ में अपनी जान दे देता है… कोई छात्र सच बोलने पर ट्रोलिंग और धमकियों का शिकार होता है…
एक जवान देश के लिए शहीद हो जाता है, लेकिन उसकी माँ को राशन कार्ड के लिए लाइन में लगना पड़ता है।
तो क्या यही आज़ादी है?
आज़ादी सिर्फ़ तिरंगा लहराने का नाम नहीं।
आज़ादी का मतलब है — सुरक्षा, सम्मान, आवाज़ और न्याय का अधिकार।
लेकिन… उम्मीद अब भी जिंदा है।
हर पीढ़ी में नए ‘क्रांतिकारी’ पैदा हो रहे हैं — पत्रकार, कार्यकर्ता, कलाकार, युवा —
जो आवाज़ उठा रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं और बदलाव ला रहे हैं।
डॉ. अंबेडकर का मंत्र याद रखिए:
“शिक्षित बनो, आंदोलन करो, संगठित हो।”
तो इस स्वतंत्रता दिवस पर… मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ:
“क्या आप सच में आज़ाद महसूस करते हो?
अगर नहीं… तो आप उस असली आज़ादी के लिए क्या कर रहे हो?”
यह सिर्फ़ एक तिथि नहीं… यह हमारी यात्रा है।
और हर आवाज़, हर कोशिश, हर कहानी इस यात्रा का हिस्सा बन सकती है।
आइए, आज हम प्रतिज्ञा करें — एक ऐसे भारत की,
जो सच में समावेशी, समान, स्वतंत्र और करुणामय हो।
क्योंकि आज़ादी मिली हुई चीज़ नहीं है…
आज़ादी हर दिन… हर पल जीती जाती है।