आज़ादी की राह में क्यों चुना गया गणेशोत्सव?

क्या आप जानते हैं कि… आज जो गणेशोत्सव हम धूमधाम से मनाते हैं… उसकी नींव सिर्फ धार्मिक कारणों से नहीं…, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक उद्देश्यों से भी जुड़ी है?...
1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने…. सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की… और इस त्योहार को सिर्फ भगवान गणेश की पूजा तक सीमित न रखकर,…. उसे आज़ादी की लड़ाई का प्रतीक बना दिया….।
आज हम आपको बताएंगे कि आखिर…. तिलक ने गणेशोत्सव को क्यों चुना,…. कैसे यह पूरे भारत में राष्ट्रवाद की आग बनकर फैला…. और किस तरह आज भी इसकी गूँज सुनाई देती है।….तो चलिए, इस ऐतिहासिक कहानी में गोते लगाते हैं और जानते हैं कि..... कैसे एक पर्व ने लाखों भारतीयों को एकजुट किया!....19वीं सदी का आखिरी दशक... भारत ब्रिटिश शासन की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था....। अंग्रेजों ने न सिर्फ हमारी आजादी छीनी थी, ...बल्कि हमारी संस्कृति, परंपराओं और एकता को भी... कमजोर करने की कोशिश की।.... ऐसे में, पुणे में एक नौजवान वकील और समाज सुधारक उभरे....—बाल गंगाधर तिलक, ....जिन्हें लोग प्यार से "लोकमान्य" कहते थे,.... यानी जनता का प्रिय।... तिलक एक विद्वान, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी थे।.... उनकी लेखनी और विचार इतने तीक्ष्ण थे कि ...अंग्रेज उनसे खौफ खाते थे....। तिलक ने देखा कि भारतीय समाज जाति..., धर्म और क्षेत्र में बंटा हुआ है....। अंग्रेजों ने "फूट डालो और राज करो" की नीति अपनाई थी।.... तिलक समझ गए कि ...अगर भारत को आजाद करना है, ....तो पहले जनता को एक मंच पर लाना होगा।.... लेकिन सवाल था—कैसे? ....ब्रिटिश सरकार ने सार्वजनिक सभाओं और.... संगठनों पर सख्त पाबंदियां लगा रखी थीं..ऐसे में तिलक ने एक अनोखा रास्ता चुना—....हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सवों का....गणेश चतुर्थी का पर्व भारत में... सदियों से मनाया जाता था,... लेकिन यह ज्यादातर घरों तक सीमित था।.... लोग अपने घरों में छोटे स्तर पर गणपति की पूजा करते थे...। तिलक ने इस परंपरा में एक क्रांतिकारी बदलाव देखा। ...उन्होंने सोचा—क्यों न गणेश उत्सव को सार्वजनिक बनाया जाए?.... गणपति, जिन्हें विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता माना जाता है, ....हर वर्ग और समुदाय में पूजे जाते हैं....। यह पर्व सभी को एकजुट करने का सही मौका था...। तिलक का मकसद सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं था।... वे चाहते थे कि गणेश उत्सव एक ऐसा मंच बने,...जहां लोग न सिर्फ पूजा करें..., बल्कि स्वतंत्रता, एकता और राष्ट्रवाद के विचारों को भी साझा करें। .....यह एक तरह से ब्रिटिश शासन के खिलाफ छिपा हुआ विरोध था...., क्योंकि अंग्रेज धार्मिक आयोजनों पर रोक नहीं लगा सकते थे।.... साल 1893, पुणे।.... तिलक ने अपने इस सपने को हकीकत में बदला....। उन्होंने स्थानीय लोगों को प्रेरित किया और... पुणे में पहली बार सार्वजनिक गणेश उत्सव का आयोजन किया।..... यह कोई छोटा-मोटा आयोजन नहीं था.....। तिलक ने इसे भव्य और समावेशी बनाया। ....विभिन्न समुदायों के लोग एक साथ आए..., गणपति की मूर्ति स्थापित की गई,.... और पूजा के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम,... भजन, कीर्तन और भाषणों का आयोजन हुआ......। इन आयोजनों में तिलक और उनके साथी राष्ट्रवादी विचारों को लोगों तक पहुंचाते थे।.... वे स्वदेशी, स्वशासन (स्वराज) और ब्रिटिश शासन के अत्याचारों के खिलाफ जागरूकता फैलाते।.... गणेश उत्सव के मंडप जनसभाओं का केंद्र बन गए,.... जहां लोग बिना डर के एकत्र हो सकते थे....यह एक मास्टरस्ट्रोक था..जहां—धार्मिक उत्सव की आड़ में स्वतंत्रता संग्राम को नई ताकत मिल रही थी....पुणे में शुरू हुआ यह उत्सव धीरे-धीरे महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में फैला....। मुंबई, नागपुर, सोलापुर जैसे शहरों में भी सार्वजनिक गणेश उत्सव की धूम मचने लगी।.... तिलक ने अपने अखबार "केसरी" के जरिए... इस उत्सव को और प्रचारित किया...। उन्होंने लोगों को समझाया कि.... यह सिर्फ पूजा का अवसर नहीं, ...बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय एकता का उत्सव है। ....इस उत्सव ने कई स्तरों पर बदलाव लाया...विभिन्न जातियों और वर्गों के लोग एक साथ आए।....गणेश उत्सव के दौरान होने वाले नाटकों..., गीतों और भाषणों ने लोगों में स्वतंत्रता की भावना को जागृत किया.... मराठी नाटक, लोकगीत और कला को बढ़ावा मिला,... जिसने स्थानीय संस्कृति को मजबूत किया...इस उत्सव ने महिलाओं को भी सार्वजनिक मंच पर आने का मौका दिया,.... जो उस समय एक बड़ा कदम था।.... ब्रिटिश सरकार को जल्दी ही समझ आ गया कि.... यह उत्सव सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है।.... गणेश मंडपों में होने वाले भाषण और... सांस्कृतिक कार्यक्रम अंग्रेजों के खिलाफ जनता को लामबंद कर रहे थे।.... लेकिन चूंकि यह एक धार्मिक उत्सव था,.... अंग्रेज इसे सीधे रोक नहीं सकते थे।.... तिलक ने अंग्रेजों की इसी कमजोरी का फायदा उठाया।... गणेश उत्सव के जरिए उन्होंने न सिर्फ जनता को एकजुट किया,... बल्कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक छिपा हुआ ...आंदोलन खड़ा कर दिया।... आज गणेश उत्सव भारत के सबसे बड़े और... भव्य त्योहारों में से एक है।... खासकर महाराष्ट्र में, यह 10 दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है।.... मुंबई का लालबागचा राजा..., पुणे का दगड़ूशेठ गणपति जैसे मंडप विश्व प्रसिद्ध हैं।..... लेकिन क्या आप जानते हैं कि.... इस भव्यता की नींव तिलक ने रखी थी? ....आज भले ही यह उत्सव धार्मिक और सांस्कृतिक रूप में ज्यादा जाना जाता हो..., लेकिन इसकी जड़ें स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी हैं...तो दोस्तों, ये थी लोकमान्य तिलक और ...सार्वजनिक गणेश उत्सव की कहानी।.... एक व्यक्ति ने एक पर्व को हथियार बनाकर.... लाखों लोगों को एकजुट किया और स्वतंत्रता संग्राम को नई ताकत दी।