बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की अमर रचना — वंदे मातरम्
आज का दिन भारत के इतिहास का एक अविस्मरणीय दिन है…7 नवंबर 1876, जब महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने…मां भारती के प्रति अपनी असीम श्रद्धा व्यक्त करते हुए….अमर राष्ट्रगीत “वंदे मातरम्” की रचना की थी।…यह रचना चिनसुरा, हुगली नदी के पास की गई थी,….जहाँ बंकिम बाबू उस समय जिला कलेक्टर के पद पर कार्यरत थे।…
यह गीत संस्कृत और बंगाली भाषा के मिश्रण में लिखा गया था….जिसने भारत माता की सुंदरता, शक्ति और गौरव का ऐसा चित्र खींचा….जो आज भी हर भारतीय के हृदय को गर्व से भर देता है।….साल 1882 में, बंकिम चंद्र ने इस गीत को…. अपने प्रसिद्ध उपन्यास‘आनंदमठ’ में प्रकाशित किया।….उपन्यास में एक संन्यासी भवानंद इस गीत को गाता है,….और यह गीत पूरे भारत के लिए स्वतंत्रता का प्रतीक बन जाता है।….इस गीत की पहली धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने तैयार की थी….और बाद में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे और मधुर स्वर दिया।….1896 में, कोलकाता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में….वंदे मातरम्’ पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया।….उस समय पूरे पंडाल में सिर्फ एक ही स्वर गूंजा ….“वंदे मातरम् वंदे मातरम्…यह गीत बन गया था भारत की आज़ादी का नारा…हर स्वतंत्रता सेनानी की जुबान पर यही गीत था,….हर क्रांतिकारी के कदमों की गूंज में यही स्वर था।….और स्वतंत्रता के बाद, 24 जनवरी 1950 को,….संविधान सभा ने ‘वंदे मातरम्’ को....राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया...जन गण मन’ के समान.... सम्मान और गौरव के साथ।.....“वंदे मातरम्” — केवल एक गीत नहीं है,
यह हमारी राष्ट्रीयता, हमारी संस्कृति,....और हमारी मां भारती के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है।....इस गीत को गाने में लगभग 65 सेकंड लगते हैं...पर इसका प्रभाव… सदियों तक अमर रहेगा।....आइए, आज हम सब मिलकर उस भावना को दोहराएं,....जिसने हमें एक किया, जिसने हमें आज़ाद किया..... फिलहाल के लिए बस इतना ही..देखते रहिए न्यूज सूरमा मिलते है... अगले वीडियो में मैं पुष्पांजली पाण्डेय..“वंदे मातरम्! वंदे मातरम्
PUSHPANJALI PANDEY 