Harda-Khidkiya-Khandwa रोड का बुरा हाल हादसे पे हादसे | जनता बेबस

 

 

यह सिर्फ़ एक खराब सड़क नहीं है, यह हरदा से खंडवा जाने वाले हज़ारों लोगों के लिए एक खतरनाक जाल है। यह वो रास्ता है, जहाँ विकास के वादे दम तोड़ देते हैं और जहाँ हर मोड़ पर ज़िंदगी दाँव पर लगी होती है। पिछले कुछ समय में इस सड़क पर लगातार हादसे हो रहे हैं, जिनमें लोगों की जानें गई हैं और कई परिवार तबाह हो गए हैं। सवाल यह है कि आखिर और कितनी जानें जाने के बाद प्रशासन जागेगा? क्या हमारी सड़कें हमें मारने के लिए बनाई गई हैं? आज हम इस सड़क की सच्चाई दिखाएंगे और उन अधिकारियों से जवाब मांगेंगे जो शायद इस गंभीर समस्या से बेखबर हैं, जबकि जनता हर रोज़ अपनी जान हथेली पर रखकर इस रास्ते से गुज़रने को मजबूर है।

हरदा-खिड़किया-खंडवा स्टेट हाईवे, नाम सुनने में जितना साधारण है, इसकी हकीकत उतनी ही डरावनी है। यह सड़क सिर्फ गड्ढों का मेला नहीं, बल्कि सरकारी अनदेखी का एक जीता-जागता सबूत है। सड़क इतनी ज़्यादा संकरी और टूटी-फूटी हो चुकी है कि दो गाड़ियों का एक साथ निकलना भी खतरे को दावत देने जैसा है। बारिश में तो हालत और भी खराब हो जाती है, जब पूरी सड़क तालाब बन जाती है और पानी से भरे गड्ढे किसी छिपे हुए दुश्मन की तरह गाड़ियों का इंतज़ार करते हैं।

एक स्थानीय बस ड्राइवर अपना दर्द बताते हुए कहते हैं, "साहब, क्या बताएँ? हर दिन घर से निकलते हुए डर लगता है कि आज सही सलामत लौटेंगे भी या नहीं। गाड़ी का कब कौन-सा हिस्सा टूट जाए, कोई भरोसा नहीं। ये सड़क नहीं, नरक का रास्ता बन गया है। पर क्या करें, मजबूरी है, कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है।"किसानों के लिए यह सड़क किसी बुरे सपने से कम नहीं है। अपनी फसल को मंडी तक पहुँचाने के लिए उन्हें इसी टूटे-फूटे रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ता है। एक किसान कहते हैं, "हमारी आधी कमाई तो गाड़ी की मरम्मत में ही निकल जाती है। टाइम पर मंडी नहीं पहुँचने से फसल का सही दाम भी नहीं मिलता। कभी-कभी तो गाड़ी गड्ढे में ऐसी धंसती है कि दूसरा ट्रैक्टर बुलाकर खिंचवाना पड़ता है। सरकार को हमारी कोई फिक्र नहीं है। वोट मांगने सब आते हैं, पर उसके बाद कोई पलटकर नहीं देखता।"यह कहानी सिर्फ ड्राइवरों या किसानों की नहीं, बल्कि हर उस आम इंसान की है, जो इस सड़क पर चलने को मजबूर है। चाहे एम्बुलेंस में किसी अपने को अस्पताल ले जाता परिवार हो, स्कूल बस में बैठा कोई बच्चा हो या फिर नौकरी पर जाता कोई नौजवान, हर कोई इस लापरवाही की कीमत चुका रहा है। इस सड़क की सबसे दर्दनाक कीमत वो परिवार चुका रहे हैं, जिन्होंने यहाँ हुए हादसों में अपनों को खो दिया है। सोचिए उन परिवारों पर क्या बीतती होगी, जिनका कोई अपना सुबह घर से काम के लिए निकलता है और फिर कभी वापस नहीं लौटता। इस हाईवे पर होने वाले हादसे अब आम हो गए हैं, और हर हादसे के पीछे एक उजड़ते हुए परिवार की कहानी है।जब आप किसी पीड़ित परिवार से मिलेंगे, तो उनका दर्द देखकर आपका दिल दहल जाएगा। एक माँ रोते हुए कहती है, "मेरा बेटा तो बस काम पर ही गया था। क्या पता था कि वो अब कभी लौटकर नहीं आएगा। उस सड़क ने मेरा सब कुछ छीन लिया। सरकार मुआवज़ा दे भी देगी, पर क्या वो मेरे बेटे को लौटा सकती है? अफ़सरों को क्या फ़र्क पड़ता है, उनके बच्चे तो बड़ी-बड़ी सुरक्षित गाड़ियों में घूमते हैं। हमारा दर्द वो कभी नहीं समझ सकते।"

इन हादसों की गूँज हरदा और खिरकिया के अस्पतालों में भी सुनाई देती है। डॉक्टर बताते हैं कि उनके पास आने वाले कई ट्रॉमा केस इसी हाईवे पर हुए हादसों के होते हैं। किसी का पैर टूट जाता है, किसी के सिर में गहरी चोट आती है, और कई तो अस्पताल पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। ये सिर्फ़ आँकड़े नहीं हैं, ये टूटते हुए सपने और उजड़ते हुए परिवार हैं। यह उस सिस्टम की नाकामी है, जिसका सबसे पहला काम अपने नागरिकों को सुरक्षा देना है। हर हादसा एक ही सवाल छोड़ जाता है - इन मौतों का ज़िम्मेदार कौन है?तो आखिर इसका ज़िम्मेदार कौन है? यह सवाल आज हरदा, खिरकिया और खंडवा का हर नागरिक पूछ रहा है। इस सड़क की बदहाली की सबसे बड़ी वजह रखरखाव में भारी कमी और सरकारी लापरवाही है। सालों से यह रास्ता जर्जर हालत में है, लेकिन इसे ठीक करने और चौड़ा करने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया गया। ऐसा नहीं है कि इस मुद्दे को उठाया नहीं गया। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने खुद केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को पत्र लिखकर इस सड़क को फोर-लेन बनाने और इसे राष्ट्रीय राजमार्ग में शामिल करने की मांग की है, ताकि इसकी हालत सुधरे और हादसों में कमी आए। लेकिन नतीजा? वही ढाक के तीन पात। वादे होते हैं, घोषणाएँ होती हैं, पर ज़मीनी हकीकत जस की तस बनी हुई है।

एक तरफ सरकारें हज़ारों करोड़ की सड़क परियोजनाओं को मंज़ूरी देने के दावे करती हैं, वहीं दूसरी तरफ हरदा-खंडवा जैसी अहम सड़कें अपनी बदहाली पर आँसू बहा रही हैं। जब कोई बड़ा हादसा होता है, तो कुछ दिनों तक हलचल मचती है, जाँच के आदेश दिए जाते हैं, लेकिन कुछ ही समय बाद सब कुछ ठंडे बस्ते में चला जाता है। यह जनता के भरोसे के साथ एक भद्दा मज़ाक है।

लेकिन अब लोग चुप बैठने वाले नहीं हैं। इस सरकारी अनदेखी के खिलाफ़ अब आवाज़ें उठने लगी हैं। स्थानीय लोग और सामाजिक संगठन लगातार इस सड़क की मरम्मत के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। कई बार लोगों ने गुस्से में आकर चक्काजाम तक किया है, ताकि उनकी आवाज़ बहरे हो चुके सिस्टम तक पहुँच सके।

 

करणी सेना जैसे संगठन भी हादसों के बाद पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए सड़क पर उतरे हैं। यह लड़ाई सिर्फ एक सड़क के लिए नहीं है, बल्कि अपने जीने के अधिकार के लिए है। यह उस व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष है, जिसने लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया है।एक युवा प्रदर्शनकारी ने कहा, "हम और कब तक चुप रहेंगे? हमारे अपने इस सड़क पर मर रहे हैं और सरकार को कोई चिंता नहीं है। हमने टैक्स दिया है, हमने वोट दिया है, हमें एक सुरक्षित सड़क पाने का पूरा हक़ है। जब तक यह सड़क नहीं बनती, हमारा आंदोलन जारी रहेगा। हम इसे मौत की सड़क नहीं, बल्कि विकास का हाईवे बनाकर ही रहेंगे।" यह गुस्सा और यह आक्रोश बिल्कुल जायज़ है।